Friday, May 1, 2015

बस कुछ यू ही

ज़िन्दगी कैसा इम्तिहान लेती है, अभी कुछ कभी कुछ नाम देती है सोचो ज़रूरी नहीं हो जायेगा पल मैं रफ़्तार बदल देती है। अकसर सोचते है ख़्वाब भी बुनते है सारे, ख़्वाब टूटने मैं बस कुछ दो पल लेती है हवा का झोंका आकर उड़ा ले जाता है दुकान ऐ मकाँ बस कुछ यादों की धुँधली सी तस्वीर छोड़ देती है। अल्लाह भगवान जो भी है तू क्यूँ उम्मीद बना कर तोड़ देता है तू ना दे वो ज़्यादा अच्छा क्यूँ बीच मँझधार मैं दामन छोड़ देता है तू। अभी कुछ दिनों की तो बात थी हर चेहरे पे एक मुसकान थी आज कुछ एसा कर दिया हर आँखो मैं अशृधार थी। नाराज़ हू तुझसे ऐ मालिके खुदा फिर भी दर पे तेरे आके पड़ा करम कर अपने बन्दों पे मालिक न कर इस तरह अपनी रहमत से जुदा। भूल हो गयी जाने अनजाने मैं गर बच्चे है तेरे हमें माफ़ कर उम्मीद है सब ठीक हो जायेगा हर चेहरा फिर से मुसकरायेगा।। -ललित

Wednesday, March 16, 2011

प्रक्रति की पुकार!

त्रासदी ही त्रासदी,चारों तरफ है त्रासदी,
समय का कुछ चक्र ऐसा, विपदा ही विपदा आ पड़ी,
कुछ जगह विद्रोह है, कुछ जगह गम से भरी,
प्रक्रति के आक्रोश से, अस्तित्व ही खतरे पड़ी,
चिंता नहीं निश्चिंत थे, धीरज से खेलते रहे,
प्रक्रति कब तक सहे, आगोश में कब तक रखे,
धर्य ने जवाब दिया, विकराल सा कुछ रूप लिया,
पलक झपका था नहीं, क्या से क्या फिर हो लिया!

लग रहा सन्देश दे रही मानव को प्रकृति इस तरह,
समय रहते संभल जाओ, न खिलवाड़ करो इस तरह,
इंसान नहीं तो क्या हुआ, मेरी भी कुछ लिमिट है,
रुक जाओ धरती पुत्र, दोहन करो न इस तरह,
कर्तव्य है हम इंसान का, प्रकृति की रक्षा करें,
खुश रहे जितना मिला, प्रक्रति को सम्मान दें,
प्रक्रति है मां समान, हर दुःख सहे सबके लिए,
मां तुम्हे पुकारती, आओ सुख दे कुछ उसे!!
- जय हिंद

Friday, October 1, 2010

भारत माता

कोई लड़े हिन्दू बन, मुस्लिम बने कोई लड़े,
छत्रिय,वैश्य, ब्रह्मिन और शुद्र आपस में भिड़े,
कोई कहे में उत्तरी,कोई कहे में दक्छ्नी,
मेरे लाल तुझको आपस में, लड़ने की आखिर क्या पड़ी!
गाँधी सुभाष आज़ाद ने, क्या सोचा कभी ये स्वप्न में,
जिस मां के लिए वो लड़े, अस्तित्वा उसका खतरे पड़े
आओ अब सब वचन दे, भारत माता के वास्ते
न आगे कभी हम लड़े, चले एकता के रस्ते||

- bharat mata ki Jai

Tuesday, September 14, 2010

इन्सान की कहानी

यूँ अचानक से बैठे बैठे
सोचा क्यूँ न कलम उठा लूँ,
कलम का सिपाही हूँ,
क्यूँ न कलम उठा लूँ|

कलम बोली पेपर से
ले अब आफत आई,
आराम से बैठे थे,
लो अब सहमत आई|

अब कुछ भी लिखेगा
औरो को पकाकर, खुद भी पकेगा,
कवी का भूत बने फिरता है,
अब भूत जैसा कुछ भी बकेगा|

तभी भूतेश्वर कवी को दिखा इंसान
थोडा हैरान कुछ परेशान,
बैठा एक कोने में अकेला,
कुछ canfuse कुछ थकेला|

सोच रहा है मूर्ख
कभी तो बड़ा बन पाउँगा,
कभी तो जिंदिगी को
जिंदिगी की तरह जी पाउँगा|

इंसान था कभी अच्चा,
अब बन पड़ा, मशीनी बच्चा
बैठा बोला, आज सोचूंगा आराम से,
कुछ करूँगा इज्जत सम्मान से|

अरे ये क्या फ़ोन क्यूँ घनघना रहा,
विचारों में डूबने से पहले, भूचाल कैसा आ रहा?

उधर से एक प्यारी सी आवाज आई,
एक महिला लगा कुछ गुनगुनायी|
स्वर महिला, शरीर से पुरुष था,
हे भगवन ये तो अपना बॉस था|

आजा बेटा बहुत सोच लिया,
सपने में भी बहुत तो खो लिया,
पैसे नहीं मिलते यहाँ आराम के,
चल लग जा, भूल इज्ज़त और सम्मान के|

क्या करता बेचारा इंसान था,
भर में बीबी बच्चे, मां बाप का ध्यान था,
खुद को समझाया, चल फिर कभी सोच लेंगे,
जिंदिगी बहुत लम्बी है, फिर कभी जी लेंगे|

ऐसे ही करते करते कब बूढा हो चला,
एक दिन शय्या पर पड़कर, चल बसा,
ख्वाब आँखों में लिए, जो जीता था,
ख्वाब आँखों में समेटे चल बसा|

बस इन्सान की इतनी सी है कहानी,
जीता रहा दूसरों के लिए जवानी,
आशावाद की पराकास्ठा देखो,
बोला अगले जन्म जी लेंगे जवानी|

कागज़ कलम कहने लगे,
जय हो भूतेश्वर कवी तुम्हारी,
कहाँ आराम से शुरू करे थे,
कहाँ पड गए भारी|

अब तो माफ़ करो कवि राज
छोड़ दो कागज कलम का साथ,
इंसान हो इंसान की तरह व्यवहार करो,
जाओ जाकर थोडा कम करो||

- ललित

Wednesday, April 1, 2009

इलेक्शन, परिवर्तन का समय!!!!

देखो देखो इलेक्शन का त्यौहार आया,
पांच वर्ष के बाद बदलाव का पैगाम आया,
नेता लगे झाकने, किसकी पकड़े पूँछ,
कौन जिताए दुबारा, नहीं पाए ये सूझ|
लगा रहे हैं गडित जातिगत विज्ञानं का,
कैसे जीते विश्वास, मतदाता अज्ञान का,
चीख रहे हैं सभी दल, पढ़ा नैतिकता का पाठ,
लगा रहे हैं, जुगत कैसे पाए सत्ता का ठाठ||

ना कोई करे बातें देश और विकास की,
चारों तरफ है चर्चा जाति, धर्म , उन्माद की,
गठबंधन को तोड़, बने फिर से गठबंधन,
चुनाव बाद, बोले- बनायेंगे फिर से गठबंधन|
प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए मची मारामारी,
मीडिया भी करे चर्चा- कौन पड़े किस पर भारी,
ना कोई करे बात मतदाता क्या है चाहे,
ढूंढ़ मचाये फिरे पार्टी, कौन हमे जिताए||

दल बदलू नेता फिर हुए सक्रिय,
अभी जीतना है भैया, फिर होंगे निष्क्रिय,
बदल मुखोटा, बदल के चोला, गीत नए फिर गाए,
कल तक जिनकी जय करते थे, आज कहे फिर हाय|
अपराधी बने योग्य, देश चलाने वास्ते,
कानून से जो खेलते थे, क्या चलेंगे कानून के रास्ते?
सभी कहे प्रतिनिधित्वा युवा को, पर टिकेट न देने पाए,
मजबूरी देखो, अस्सी वर्षीया भी खुद को युवा बताएं||

कहने को तो बहुत है भैया, सब है आपको ज्ञान,
कुछ ऐसा करो कि लोग जाएँ फिर मान,
देखो, परखो, प्रत्याशी को, जो करे विकास कि बात,
हरा भगाओ नेताओ को, करें जाति धरम कि बात|
वोट डालने जरुर ही जाना, जन चेतना भी फैलाना है,
अच्छे नागरिक बने सांसद, कुछ ऐसे जुगत भिडाना है,
अब नहीं चेते, फिर पछताए,पांच साल कि बात गयी,
दोषारोपद फिर मत करना, जब बर्बादी शुरुआत हुई||

करे निवेदन 'पाठक' तुमसे, संभलो देश जवान के,
अज्ञानी फिर खेल ना पायें तुम जैसे विद्वान से,
दिखा दो ताकत फिर से तुम, मतदाता अधिकार की,
सोचने को मजबूर हो जाये, प्रजातंत्र सरकार भी|
उम्मीद के साथ अंत करता हूं,
कि परिवर्तन फिर आएगा,
इसी अंत के साथ,
नया अध्याय शुरू हो जायेगा||

-जय हिंद

Saturday, August 9, 2008

Shreya's Album

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Monday, August 4, 2008

Love Marriage: dilemma b/w DIL & DIMAG

दीवाना दिल धड़कता है,
किसी के प्यार मैं, लेकिन
मुआ दिमाग कहता है,
मत खेल धड़कन से,
कभी भी पिट सकता है,
और धड़कन रुक सकता है,
जिंदिगी रुक जायेगी,
अगर सुनेगा तू दिल की|

इंतजार कर माँ-बाप का,
धुंड लेंगे दिल धड़कने को,
दिल भी धड़का लेना,
मोहब्बत की पींगे बढा लेना,
और कुछ गलत हो जाये तो,
माँ बाप से दुखडा रो लेना,
लाये थे तुम ही इसको,
ऐसे कुछ नाराज़ हो लेना|

अगर सुनेगा तू दिल की,
और चडेगा सीधी इमोशन की,
संभल जा पछतायेगा,
नाराज़ हो भी न पायेगा,
दिल धडकना तो दूर,
ठीक से रो भी ना पायेगा,
जिंदिगी की बड़ी भूल
ऐसे कुछ पछता भी न पायेगा|

मैं तो मजाक कर रहा था,
कुछ ऐसे ही बक रहा था,
अगर तू प्यार करता है
और तेरा दिल धड़कता है,
मत सुन दिमाग की,
और बात मान तू दिल की,
माँ- बाप भी होंगे खुशी,
रहत उनको जो तुने दे दी||