Friday, May 1, 2015

बस कुछ यू ही

ज़िन्दगी कैसा इम्तिहान लेती है, अभी कुछ कभी कुछ नाम देती है सोचो ज़रूरी नहीं हो जायेगा पल मैं रफ़्तार बदल देती है। अकसर सोचते है ख़्वाब भी बुनते है सारे, ख़्वाब टूटने मैं बस कुछ दो पल लेती है हवा का झोंका आकर उड़ा ले जाता है दुकान ऐ मकाँ बस कुछ यादों की धुँधली सी तस्वीर छोड़ देती है। अल्लाह भगवान जो भी है तू क्यूँ उम्मीद बना कर तोड़ देता है तू ना दे वो ज़्यादा अच्छा क्यूँ बीच मँझधार मैं दामन छोड़ देता है तू। अभी कुछ दिनों की तो बात थी हर चेहरे पे एक मुसकान थी आज कुछ एसा कर दिया हर आँखो मैं अशृधार थी। नाराज़ हू तुझसे ऐ मालिके खुदा फिर भी दर पे तेरे आके पड़ा करम कर अपने बन्दों पे मालिक न कर इस तरह अपनी रहमत से जुदा। भूल हो गयी जाने अनजाने मैं गर बच्चे है तेरे हमें माफ़ कर उम्मीद है सब ठीक हो जायेगा हर चेहरा फिर से मुसकरायेगा।। -ललित