यूँ अचानक से बैठे बैठे
सोचा क्यूँ न कलम उठा लूँ,
कलम का सिपाही हूँ,
क्यूँ न कलम उठा लूँ|
कलम बोली पेपर से
ले अब आफत आई,
आराम से बैठे थे,
लो अब सहमत आई|
अब कुछ भी लिखेगा
औरो को पकाकर, खुद भी पकेगा,
कवी का भूत बने फिरता है,
अब भूत जैसा कुछ भी बकेगा|
तभी भूतेश्वर कवी को दिखा इंसान
थोडा हैरान कुछ परेशान,
बैठा एक कोने में अकेला,
कुछ canfuse कुछ थकेला|
सोच रहा है मूर्ख
कभी तो बड़ा बन पाउँगा,
कभी तो जिंदिगी को
जिंदिगी की तरह जी पाउँगा|
इंसान था कभी अच्चा,
अब बन पड़ा, मशीनी बच्चा
बैठा बोला, आज सोचूंगा आराम से,
कुछ करूँगा इज्जत सम्मान से|
अरे ये क्या फ़ोन क्यूँ घनघना रहा,
विचारों में डूबने से पहले, भूचाल कैसा आ रहा?
उधर से एक प्यारी सी आवाज आई,
एक महिला लगा कुछ गुनगुनायी|
स्वर महिला, शरीर से पुरुष था,
हे भगवन ये तो अपना बॉस था|
आजा बेटा बहुत सोच लिया,
सपने में भी बहुत तो खो लिया,
पैसे नहीं मिलते यहाँ आराम के,
चल लग जा, भूल इज्ज़त और सम्मान के|
क्या करता बेचारा इंसान था,
भर में बीबी बच्चे, मां बाप का ध्यान था,
खुद को समझाया, चल फिर कभी सोच लेंगे,
जिंदिगी बहुत लम्बी है, फिर कभी जी लेंगे|
ऐसे ही करते करते कब बूढा हो चला,
एक दिन शय्या पर पड़कर, चल बसा,
ख्वाब आँखों में लिए, जो जीता था,
ख्वाब आँखों में समेटे चल बसा|
बस इन्सान की इतनी सी है कहानी,
जीता रहा दूसरों के लिए जवानी,
आशावाद की पराकास्ठा देखो,
बोला अगले जन्म जी लेंगे जवानी|
कागज़ कलम कहने लगे,
जय हो भूतेश्वर कवी तुम्हारी,
कहाँ आराम से शुरू करे थे,
कहाँ पड गए भारी|
अब तो माफ़ करो कवि राज
छोड़ दो कागज कलम का साथ,
इंसान हो इंसान की तरह व्यवहार करो,
जाओ जाकर थोडा कम करो||
- ललित
Tuesday, September 14, 2010
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