त्रासदी ही त्रासदी,चारों तरफ है त्रासदी,
समय का कुछ चक्र ऐसा, विपदा ही विपदा आ पड़ी,
कुछ जगह विद्रोह है, कुछ जगह गम से भरी,
प्रक्रति के आक्रोश से, अस्तित्व ही खतरे पड़ी,
चिंता नहीं निश्चिंत थे, धीरज से खेलते रहे,
प्रक्रति कब तक सहे, आगोश में कब तक रखे,
धर्य ने जवाब दिया, विकराल सा कुछ रूप लिया,
पलक झपका था नहीं, क्या से क्या फिर हो लिया!
लग रहा सन्देश दे रही मानव को प्रकृति इस तरह,
समय रहते संभल जाओ, न खिलवाड़ करो इस तरह,
इंसान नहीं तो क्या हुआ, मेरी भी कुछ लिमिट है,
रुक जाओ धरती पुत्र, दोहन करो न इस तरह,
कर्तव्य है हम इंसान का, प्रकृति की रक्षा करें,
खुश रहे जितना मिला, प्रक्रति को सम्मान दें,
प्रक्रति है मां समान, हर दुःख सहे सबके लिए,
मां तुम्हे पुकारती, आओ सुख दे कुछ उसे!!
- जय हिंद
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2 comments:
Earth provides enough to satisfy every man's need, but not every man's greed.
-Mahatma Gandhi
Kundan...Few lines in this poem are inspired by this thought only...
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