Friday, October 1, 2010

भारत माता

कोई लड़े हिन्दू बन, मुस्लिम बने कोई लड़े,
छत्रिय,वैश्य, ब्रह्मिन और शुद्र आपस में भिड़े,
कोई कहे में उत्तरी,कोई कहे में दक्छ्नी,
मेरे लाल तुझको आपस में, लड़ने की आखिर क्या पड़ी!
गाँधी सुभाष आज़ाद ने, क्या सोचा कभी ये स्वप्न में,
जिस मां के लिए वो लड़े, अस्तित्वा उसका खतरे पड़े
आओ अब सब वचन दे, भारत माता के वास्ते
न आगे कभी हम लड़े, चले एकता के रस्ते||

- bharat mata ki Jai

Tuesday, September 14, 2010

इन्सान की कहानी

यूँ अचानक से बैठे बैठे
सोचा क्यूँ न कलम उठा लूँ,
कलम का सिपाही हूँ,
क्यूँ न कलम उठा लूँ|

कलम बोली पेपर से
ले अब आफत आई,
आराम से बैठे थे,
लो अब सहमत आई|

अब कुछ भी लिखेगा
औरो को पकाकर, खुद भी पकेगा,
कवी का भूत बने फिरता है,
अब भूत जैसा कुछ भी बकेगा|

तभी भूतेश्वर कवी को दिखा इंसान
थोडा हैरान कुछ परेशान,
बैठा एक कोने में अकेला,
कुछ canfuse कुछ थकेला|

सोच रहा है मूर्ख
कभी तो बड़ा बन पाउँगा,
कभी तो जिंदिगी को
जिंदिगी की तरह जी पाउँगा|

इंसान था कभी अच्चा,
अब बन पड़ा, मशीनी बच्चा
बैठा बोला, आज सोचूंगा आराम से,
कुछ करूँगा इज्जत सम्मान से|

अरे ये क्या फ़ोन क्यूँ घनघना रहा,
विचारों में डूबने से पहले, भूचाल कैसा आ रहा?

उधर से एक प्यारी सी आवाज आई,
एक महिला लगा कुछ गुनगुनायी|
स्वर महिला, शरीर से पुरुष था,
हे भगवन ये तो अपना बॉस था|

आजा बेटा बहुत सोच लिया,
सपने में भी बहुत तो खो लिया,
पैसे नहीं मिलते यहाँ आराम के,
चल लग जा, भूल इज्ज़त और सम्मान के|

क्या करता बेचारा इंसान था,
भर में बीबी बच्चे, मां बाप का ध्यान था,
खुद को समझाया, चल फिर कभी सोच लेंगे,
जिंदिगी बहुत लम्बी है, फिर कभी जी लेंगे|

ऐसे ही करते करते कब बूढा हो चला,
एक दिन शय्या पर पड़कर, चल बसा,
ख्वाब आँखों में लिए, जो जीता था,
ख्वाब आँखों में समेटे चल बसा|

बस इन्सान की इतनी सी है कहानी,
जीता रहा दूसरों के लिए जवानी,
आशावाद की पराकास्ठा देखो,
बोला अगले जन्म जी लेंगे जवानी|

कागज़ कलम कहने लगे,
जय हो भूतेश्वर कवी तुम्हारी,
कहाँ आराम से शुरू करे थे,
कहाँ पड गए भारी|

अब तो माफ़ करो कवि राज
छोड़ दो कागज कलम का साथ,
इंसान हो इंसान की तरह व्यवहार करो,
जाओ जाकर थोडा कम करो||

- ललित